
चंदौली। दूसरे मुहर्रम के अवसर पर अज़ाखाना-ए-रज़ा में आयोजित मजलिस में मौलाना जाफर रिजवी ने कहा कि इमाम हुसैन की शहादत इंसानियत, न्याय और इस्लामी मूल्यों की रक्षा के लिए दी गई एक महान कुर्बानी है। उन्होंने कहा कि मजलिसों का उद्देश्य दुनिया के सामने इस्लाम की सही तस्वीर पेश करना है, जिसका मूल संदेश सद्भाव, उदारता और मानवता है।
मौलाना ने कहा कि इस्लाम भेदभाव और फिरक़ापरस्ती की शिक्षा नहीं देता। पवित्र कुरआन में फिरक़ा परस्ती की निंदा की गई है और इसे बड़ा गुनाह बताया गया है। उन्होंने कहा कि जब-जब इस्लामी सिद्धांतों में विचलन आया, तब हजरत अली और बाद में उनके नवासे इमाम हुसैन ने उसके खिलाफ संघर्ष किया। करबला की जंग सत्ता प्राप्ति के लिए नहीं, बल्कि इस्लामी मूल्यों और सत्य की रक्षा के लिए लड़ी गई थी। इसी कारण आज इमाम हुसैन का नाम पूरी दुनिया में सम्मान के साथ लिया जाता है।
मौलाना ने कहा कि रसूलल्लाह की पूरी तालीम इंसानियत की रक्षा और लोगों को एकजुट करने के लिए थी। लेकिन समय के साथ लोग विभिन्न फिरकों में बंटते चले गए और इस्लाम की वास्तविक शिक्षाएं पीछे छूटती गईं। उन्होंने कहा कि किसी अच्छे उद्देश्य के लिए अपना सर्वस्व न्योछावर करना आसान नहीं होता, लेकिन इमाम हुसैन ने इस्लाम की रक्षा के लिए अपनी जान तक कुर्बान कर दी।
मजलिस के दौरान मायल चंदौलवी, वकार सुल्तानपुरी, शहंशाह मिर्जापुरी सहित विभिन्न शायरों और पेशख्वानों ने अपने कलाम और नौहे पेश कर माहौल को गमगीन बना दिया। इस अवसर पर विभिन्न अंजुमनों के संचालकों को मुहर्रम के प्रतीक चिन्ह भेंट कर सम्मानित भी किया गया।
कार्यक्रम में दुल्हीपुर से आई अंजुमन यादगारे हुसैनी ने अपना पारंपरिक मातम पेश कर इमाम हुसैन को श्रद्धांजलि अर्पित की। अज़ाखाना-ए-रज़ा के प्रबंधक डॉ. सैयद गजन्फर इमाम ने बताया कि मुहर्रम की पांचवीं तारीख को अज़ाखाना-ए-रज़ा से अलम और ताबूत का जुलूस निकाला जाएगा, जिसमें सभी धर्मों के लोग शामिल होंगे।
मजलिस में इब्ने हसन, इंसाफ़, इरशाद भाई, सरवर भाई, वसीम अहमद, इमरान परवेज़, आसिफ़, राजू टाइगर, मोहम्मद इंसान, रियाज़ राईन, दानिश, सैयद अली इमाम, काशिफ़, जीशान हैदर सहित बड़ी संख्या में अज़ादार उपस्थित रहे।

