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जयंती पर विशेष: पंडित कमलापति त्रिपाठी : एक ऐसा व्यक्तित्व, जिनका पद से बड़ा कद, हमेशा बरकरार रहेगी ख्याति

121वीं जयंती पर विशेष                                              – डॉ. विनय प्रकाश तिवारी                                  चंदौली। आज 3 सितंबर को पंडित कमलापति त्रिपाठी जी की 121वीं जयंती पर उन्हें नमन करते हुए मेरे मन में सबसे पहले एक ही विचार आता है— राजनीति में पद बहुत लोगों को मिलते हैं, लेकिन कद बहुत कम लोग बना पाते हैं। कुछ व्यक्तित्व ऐसे होते हैं जिन्हें पूर्व मुख्यमंत्री, पूर्व केंद्रीय मंत्री या पूर्व सांसद जैसे पदों से परिचित कराना ही उनके व्यक्तित्व को छोटा कर देना होता है। पंडित कमलापति त्रिपाठी जी ऐसे ही व्यक्तित्व थे। वह उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री रहे, देश के रेल मंत्री रहे, स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़े रहे और राष्ट्रीय राजनीति के शिखर तक पहुंचे। लेकिन हम चंदौली वालों के लिए उनका परिचय इन पदों से कहीं बड़ा है। क्योंकि कमलापति जी केवल राजनीति में बड़े नहीं हुए, उनके बड़े होने के साथ चंदौली भी बड़ा हुआ। और मेरे लिए किसी जननेता की सफलता का इससे बड़ा प्रमाण शायद ही कोई हो सकता है।

चंदौली की नहरें केवल पानी नहीं, एक दूरदर्शी सोच लेकर आईं

आज हम बड़े गर्व से कहते हैं कि हमारा चंदौली “धान का कटोरा” है। लेकिन कभी सोचिए कि धान का कटोरा बनने के पीछे क्या है? हमारी उपजाऊ मिट्टी है। हमारे किसानों की अथक मेहनत है। और खेतों तक पानी पहुंचाने वाली मजबूत सिंचाई व्यवस्था है। चंदौली में दूर-दूर तक फैली नहरों का जाल यहां की कृषि व्यवस्था की रीढ़ बना। इस सिंचाई व्यवस्था के विकास और विस्तार के साथ पंडित कमलापति त्रिपाठी जी का नाम आज भी चंदौली की पुरानी पीढ़ियां बड़े सम्मान के साथ जोड़ती हैं। यह केवल नहरों का निर्माण नहीं था। यह उस दौर की दूरदर्शी सोच थी जिसमें यह समझ थी कि यदि किसान के खेत तक पानी पहुंचा दिया जाए तो केवल एक फसल नहीं बदलेगी, बल्कि पूरे क्षेत्र की अर्थव्यवस्था बदल सकती है। नहर खेत तक पहुंची तो केवल पानी नहीं पहुंचा। पानी के साथ किसान की उम्मीद पहुंची। खेतों में फसल पहुंची। घरों में खुशहाली पहुंची। और धीरे-धीरे चंदौली के खेतों में पैदा होने वाले धान ने इस जिले को वह पहचान दी जिसे आज पूरा प्रदेश जानता है— “धान का कटोरा।” आज भी जब चंदौली के खेतों में दूर-दूर तक लहलहाती धान की फसल दिखाई देती है तो उसके पीछे हमारे किसानों की मेहनत के साथ उस सिंचाई व्यवस्था की भूमिका भी दिखाई देती है जिसने खेती को भरोसा दिया। कितनी बड़ी बात है कि एक राजनेता के किए गए कार्यों की चर्चा उसके जीवनकाल तक सीमित न रहे, बल्कि पीढ़ियां बदलने के बाद भी किसान उसके योगदान को याद करे।

न फेसबुक था, न इंस्टाग्राम, न रील… फिर भी नाम आज तक है

कभी-कभी मैं आज की राजनीति और उस दौर की राजनीति के बीच का अंतर सोचता हूं। आज कोई छोटा सा काम भी होता है तो उसकी तस्वीर कुछ मिनटों में सोशल मीडिया पर पहुंच जाती है। पोस्ट बनती है, वीडियो बनता है, रील बनती है और प्रचार होता है। कमलापति जी के समय इनमें से कुछ नहीं था। न फेसबुक था। न इंस्टाग्राम था। न व्हाट्सएप था। न रील थी। फिर भी आज गांव का बुजुर्ग आपको बता देता है—“यह काम कमलापति जी के समय हुआ था।”

इससे बड़ा प्रचार किसी राजनेता को क्या चाहिए? पोस्टर उतर जाते हैं। होर्डिंग फट जाते हैं। अखबार अगले दिन बदल जाता है। सोशल मीडिया की पोस्ट नीचे चली जाती है। लेकिन जमीन पर किया गया काम वहीं रहता है और उसकी कहानी एक पीढ़ी दूसरी पीढ़ी को सुनाती रहती है। शायद यही कारण है कि आज उनकी 121वीं जयंती पर भी हम केवल एक बीते हुए राजनेता को याद नहीं कर रहे हैं। हम उस सोच को याद कर रहे हैं जिसके निशान आज भी हमारे आसपास मौजूद हैं।

 

मुगलसराय और रेलवे का रिश्ता भी उन्हें याद करता है

पंडित दीनदयाल उपाध्याय नगर की चर्चा रेलवे के बिना अधूरी है और पंडित कमलापति त्रिपाठी जी के राजनीतिक जीवन की चर्चा रेल मंत्रालय के बिना। देश के रेल मंत्री के रूप में उनका कार्यकाल इस बात का प्रमाण था कि पूर्वांचल का एक नेता राष्ट्रीय राजनीति में कितना बड़ा कद रखता था। पंडित दीनदयाल उपाध्याय नगर देश के सबसे महत्वपूर्ण रेलवे केंद्रों में रहा है। इसके विकास की लंबी यात्रा किसी एक व्यक्ति या एक सरकार की देन नहीं है। इसमें अलग-अलग दौर की सरकारों, रेल मंत्रियों, अधिकारियों, कर्मचारियों और जनप्रतिनिधियों का योगदान रहा है।

कमलापति जी के दौर को पूर्वांचल के लोग इसलिए विशेष रूप से याद करते हैं क्योंकि दिल्ली में बैठा इतना बड़ा नेता इस मिट्टी और इसकी जरूरतों को समझता था। उस समय इस क्षेत्र के लोगों के मन में एक भरोसा था— दिल्ली में कोई ऐसा व्यक्ति बैठा है जिसके सामने पूर्वांचल अपनी बात मजबूती से रख सकता है। मेरे विचार से राजनीतिक ताकत की इससे सुंदर परिभाषा शायद ही हो सकती है। आप कितने शक्तिशाली हैं, यह केवल इससे तय नहीं होता कि आपके पास कौन सा पद है। आपकी असली शक्ति तब दिखाई देती है जब आपके क्षेत्र के लोगों को आपके बड़े होने का भरोसा हो।

 

दिल्ली पहुंचकर भी अपनी मिट्टी को नहीं भूले

बड़े पद तक पहुंच जाना कठिन है, लेकिन बड़े पद पर पहुंचकर अपनी मिट्टी को याद रखना उससे भी बड़ी बात है। पंडित कमलापति त्रिपाठी जी राष्ट्रीय राजनीति के बड़े व्यक्तित्व बने, लेकिन पूर्वांचल उनकी पहचान से कभी अलग नहीं हुआ। वह केवल राजनेता नहीं थे। पत्रकारिता और साहित्य से भी उनका गहरा संबंध था। स्वतंत्रता आंदोलन की तपिश से निकली उस पीढ़ी की राजनीति में अध्ययन, विचार और सार्वजनिक जीवन की एक अलग गरिमा दिखाई देती थी। उस समय राजनीति में मतभेद भी होते थे, संघर्ष भी होते थे और चुनाव भी पूरी ताकत से लड़े जाते थे, लेकिन बड़े व्यक्तित्वों के प्रति सम्मान की एक परंपरा भी थी। आज शायद उसी राजनीतिक गरिमा को फिर याद करने की आवश्यकता है।

 

कमलापति जी किसी एक पार्टी की विरासत नहीं

पंडित कमलापति त्रिपाठी जी कांग्रेस के बड़े नेता थे। आज राजनीति बदल चुकी है। पार्टियां अलग हैं, विचारधाराएं अलग हैं और राजनीतिक संघर्ष भी पहले से कहीं अधिक तीखा है। लेकिन मेरी एक स्पष्ट मान्यता है— इतिहास को पार्टी का चश्मा पहनाकर नहीं पढ़ना चाहिए। किसी व्यक्ति की विचारधारा से हमारी सहमति या असहमति हो सकती है। लेकिन यदि उसने हमारे क्षेत्र के लिए ऐसा काम किया जिसका लाभ कई पीढ़ियों को मिला, तो उसका सम्मान करना किसी राजनीतिक दल का समर्थन नहीं, बल्कि अपनी मिट्टी और अपने इतिहास का सम्मान है। आज यदि कोई भाजपा में है, समाजवादी पार्टी में है, कांग्रेस में है, बसपा में है या किसी भी राजनीतिक विचारधारा को मानता है-इससे पंडित कमलापति त्रिपाठी जी के ऐतिहासिक योगदान का मूल्य कम नहीं हो जाता। क्योंकि कुछ व्यक्तित्व पार्टी की सीमा से बहुत आगे निकल जाते हैं। इसलिए मेरे लिए पंडित कमलापति त्रिपाठी जी केवल कांग्रेस की विरासत नहीं हैं। वह पूर्वांचल की विरासत हैं। वह चंदौली की विरासत हैं। और अपनी विरासत पर गर्व करने के लिए किसी राजनीतिक अनुमति की आवश्यकता नहीं होती।

 

आज चंदौली को फिर वैसे ही बड़े सपने देखने चाहिए

आज उनकी जयंती पर उन्हें याद करते हुए केवल अतीत की प्रशंसा कर देना पर्याप्त नहीं होगा। उनकी विरासत हमें वर्तमान से एक प्रश्न पूछने के लिए भी मजबूर करती है- क्या चंदौली फिर वैसा राजनीतिक कद पैदा कर सकता है? हमारी राजनीति केवल इस बात तक सीमित न हो कि अगला विधायक कौन बनेगा, अगला सांसद कौन बनेगा या किसे मंत्री पद मिलेगा। चंदौली का सपना इससे बड़ा होना चाहिए। हमारी इस मिट्टी से फिर ऐसे व्यक्तित्व निकलने चाहिए जिनकी आवाज लखनऊ में सुनी जाए और जिनकी उपस्थिति दिल्ली में महसूस की जाए। ऐसा नेतृत्व जिसके बड़े होने पर केवल उसका परिवार, उसके समर्थक या उसकी पार्टी बड़ी न हो- उसके साथ उसका क्षेत्र भी बड़ा हो। चंदौली को फिर ऐसा नेतृत्व चाहिए जिसके दिल्ली पहुंचने पर चंदौली को लगे कि हमारा कोई अपना वहां पहुंचा है। और जिसके पास शक्ति आने पर उसका पहला प्रभाव इस मिट्टी पर दिखाई दे।

 

आज की पीढ़ी की अपनी ‘नहरें’ क्या होंगी?

कमलापति जी के दौर की आवश्यकता सिंचाई थी। नहरों ने किसानों और खेती की तस्वीर बदलने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। लेकिन आज समय बदल चुका है। इसलिए आज की पीढ़ी को केवल पुरानी उपलब्धियों का गुणगान नहीं करना चाहिए, बल्कि स्वयं से पूछना चाहिए- हम अपनी अगली पीढ़ी के लिए क्या छोड़कर जाएंगे? आज किसान को आधुनिक कृषि, सिंचाई और बेहतर बाजार चाहिए। युवाओं को रोजगार चाहिए। बच्चों को ऐसी शिक्षा चाहिए कि उन्हें बड़े अवसरों के लिए अपना जिला छोड़ना मजबूरी न लगे। बेहतर स्वास्थ्य सुविधाएं चाहिए। उद्योग चाहिए। व्यापार के नए अवसर चाहिए। बेहतर सड़कें और आधुनिक आधारभूत संरचना चाहिए। आज शायद चंदौली को केवल पानी पहुंचाने वाली नहरों की नहीं, बल्कि अवसर पहुंचाने वाली नई नहरों की आवश्यकता है। शिक्षा की नहर। रोजगार की नहर। उद्योग की नहर। स्वास्थ्य की नहर। तकनीक की नहर। ताकि जिस प्रकार पिछली पीढ़ी ने खेतों तक पानी पहुंचाया, हमारी पीढ़ी आने वाली पीढ़ियों तक अवसर पहुंचा सके।

 

कभी चंदौली की किसी नहर के किनारे खड़े होकर देखिए…

दूर तक लहलहाते धान के खेत। उन खेतों के बीच बहता पानी। और उस पानी पर निर्भर हजारों किसान परिवार। वह दृश्य राजनीति का बहुत बड़ा पाठ पढ़ाता है। नेता चला गया। सरकार चली गई। समय बदल गया। पीढ़ियां बदल गईं। लेकिन नहर में पानी आज भी बह रहा है। खेत आज भी लहलहा रहे हैं। शायद सार्वजनिक जीवन की सफलता का इससे सुंदर पैमाना कुछ नहीं हो सकता। मुख्यमंत्री का कार्यकाल समाप्त हो जाता है। मंत्री का कार्यकाल समाप्त हो जाता है। सांसद और विधायक का कार्यकाल भी समाप्त हो जाता है। लेकिन समाज के लिए किए गए कार्यों का कार्यकाल कभी समाप्त नहीं होता।

 

इसीलिए आज पंडित कमलापति त्रिपाठी जी की 121वीं जयंती पर मैं केवल यह नहीं कह सकता कि उनका कद उनके पद से बड़ा था। उनके काम और उनकी स्मृतियां आज भी इस मिट्टी में मौजूद हैं, इसलिए उनका कद उनके पद से बड़ा है और जब तक चंदौली अपनी मिट्टी, अपने किसानों, अपनी नहरों, अपने इतिहास और अपने उन महापुरुषों को याद रखेगा जिन्होंने इस क्षेत्र के भविष्य के लिए काम किया-उनका कद उनके पद से बड़ा रहेगा।

 

पंडित कमलापति त्रिपाठी जी हमें यह सिखाकर गए कि राजनीति में अपने लिए पद प्राप्त करना उपलब्धि हो सकती है, लेकिन अपने पद के माध्यम से अपनी मिट्टी के लिए कुछ ऐसा कर जाना जिसे आने वाली पीढ़ियां याद रखें-वही असली विरासत है।

 

आज उनकी 121वीं जयंती पर उस महान व्यक्तित्व को मेरा शत-शत नमन

-डॉ. विनय प्रकाश तिवारी

संस्थापक — LTP Calculator एवं Daddy’s International School

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