
चंदौली। गांवों की सुबह आमतौर पर उम्मीद और मेहनत के साथ शुरू होती है, लेकिन बेन–धरौली मार्ग से गुजरने वाले लोगों के लिए हर सुबह चिंता और डर लेकर आती है। चंदौली पहुंचने का सबसे छोटा और सुगम मार्ग माने जाने वाला यह रास्ता अब लोगों के लिए राहत नहीं, बल्कि रोजमर्रा की परेशानी और जोखिम का प्रतीक बन चुका है।
इस सड़क पर कदम रखते ही ऐसा महसूस होता है मानो यह कोई सड़क नहीं, बल्कि गहरे गड्ढों की कतार हो। कहीं दो फीट तो कहीं तीन फीट और कई स्थानों पर पांच फीट तक गहरे गड्ढे मौजूद हैं। वाहन चालकों को हर पल सतर्क रहना पड़ता है, क्योंकि जरा सी चूक गंभीर हादसे में बदल सकती है। स्थानीय लोगों का कहना है कि इस मार्ग पर चलते समय दुर्घटना का डर हमेशा बना रहता है।
इस मार्ग से सैकड़ों गांव जुड़े हुए हैं। इन्हीं रास्तों से बच्चे रोज साइकिल या पैदल चलकर दूर-दराज के स्कूल और कॉलेज जाते हैं। पढ़ाई की शुरुआत से पहले ही उन्हें खराब सड़क से जूझना पड़ता है। बरसात के मौसम में स्थिति और भी भयावह हो जाती है, जब गड्ढे पानी से भर जाते हैं और उनकी गहराई का अंदाजा लगाना मुश्किल हो जाता है। ऐसे में यह सड़क किसी जाल से कम नहीं लगती।
बेन–धरौली मार्ग सिर्फ आम लोगों के लिए ही नहीं, बल्कि एम्बुलेंस, स्कूली वाहन और अन्य आपातकालीन सेवाओं के लिए भी बेहद महत्वपूर्ण है। ग्रामीणों का कहना है कि कई बार आपात स्थिति में मरीज को अस्पताल ले जाते समय एम्बुलेंस गड्ढों में फंस जाती है। ऐसे में समय पर इलाज न मिल पाने का खतरा बढ़ जाता है और मरीज की हालत रास्ते में ही बिगड़ जाती है।
स्थानीय निवासियों में सड़क की बदहाली को लेकर गहरा रोष है। उनका आरोप है कि सड़क निर्माण और मरम्मत के नाम पर केवल औपचारिकता निभाई जाती है। गड्ढों पर ऊपर-ऊपर पैचवर्क कर दिया जाता है, जो कुछ ही दिनों में उखड़ जाता है और समस्या जस की तस बनी रहती है। हर बार नई उम्मीद के साथ मरम्मत होती है, लेकिन कुछ समय बाद वही हालात फिर सामने आ जाते हैं।
बेन से इलिया होते हुए धरौली और चंदौली को जोड़ने वाला यह मार्ग कभी क्षेत्र के विकास की पहचान माना जाता था। आज वही सड़क दर्द, डर और परेशानी की दास्तान बन चुकी है। ग्रामीणों और राहगीरों की प्रशासन से एक ही मांग है कि इस मार्ग की अस्थायी मरम्मत नहीं, बल्कि स्थायी और गुणवत्तापूर्ण निर्माण कराया जाए, ताकि लोगों को सुरक्षित और सुगम यात्रा का अधिकार मिल सके।

