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अचानक काशी में जुटे देश भर के किन्नर, 300 वर्ष पुराना है इतिहास

वाराणसी। देशभर के किन्नरों ने किन्नर अखाड़ा के नेतृत्व में बुधवार को काशी के पिशाच मोचन स्थित घाट पर पितरों सहित किन्नर गुरुओं की आत्मा की शांति हेतु त्रिपिंडी श्राद्ध किया। यह कार्यक्रम तकरीबन दो घंटे तक चला। पूजन को मुन्ना लाल पंडा ने विधि-विधान से संपन्न कराया। किन्नर समाज के लोग वर्ष में एक दफा यह पूजन करते हैं।
आचार्य महामंडलेश्वर लक्ष्मी नारायण त्रिपाठी, देवी पवित्रा, कामिनी माई के साथ दर्जनों की संख्या में किन्नरों का बनारस में आगमन हुआ। इतिहास में पहली बार महाभारत काल के शिखंडी द्वारा पिंडदान किए जाने के करीब तीन सौ वर्षों के बाद किन्नरों ने अपने पूर्वजों का पिंडदान कर के एक नई परम्परा की शुरुआत की थी। अपने पूर्वजों की आत्मा की शांति और उनके मोक्ष की प्राप्ति के लिए सारे किन्नरों ने बुधवार को पूरे विधि-विधान के साथ तर्पण किया और साथ ही साथ अपने पूर्वजों की आत्मा की शांति के लिए प्रार्थना की। साथ ही किन्नर गुरु एकता जोशी की हत्या के लिए भी विशेष पूजन-अर्चन किया गया। आचार्य महामंडलेश्वर लक्ष्मी नारायण त्रिपाठी ने बताया कि हिंदू धर्म की मान्यता के अनुसार, अश्विन माह के कृष्ण पक्ष से अमावस्या तक अपने पितरों के श्राद्ध की परम्परा है। ये श्राद्ध या महालया पक्ष के नाम से भी जाना जाता है, हिंदू धर्म और वैदिक मान्यताओं में पितृ योनि की स्वीकृति और आस्था के कारण श्राद्ध का प्रचलन है। पिंडदान मोक्ष प्राप्ति का एक सहज और सरल मार्ग है। पूजन के दौरान मुख्य आचार्य नीरज पांडेय, मुख्य पंडा पिशाच मोचन आनंद पांडेय, श्री मणिकर्णिका तीर्थ पुरोहित गौरव द्विवेदी व गंगा महासभा के राष्ट्रीय मंत्री मयंक कुमार आदि मौजूद रहे।

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