
चंदौली। अलीनगर में टैंकरों से तेल चोरी पुराना कोढ़ रहा है। कभी स्थानीय पुलिस तो कभी सीबीआई के हाथ तेल माफियाओं की गरदन तक पहुंचते रहे हैं। लेकिन कोई भी सिंडीकेट के काकस को तोड़ नहीं पाया। पुलिस और जिला पूर्ति विभाग के कुछ भ्रष्ट अधिकारियों और कर्मचारियों का संरक्षण पाकर यह अवैध कारोबार बेपरवाह परवान चढ़ता रहा। जबकि एडीजी की टीम ने इस काले कारोबार की परतें खोली हैं, जिससे तेल चोरी का मामला फिर से सुर्खियों में आ गया है। साथ ही तेल माफियाओं के नाम भी उजागर हुए हैं।
पुराने रोग की तरह लौटता रहा मामला
अलीनगर स्थित इंडियन ऑयल टर्मिनल के आसपास तेल चोरी की घटनाएं नई नहीं हैं। वर्षों से यह अवैध कारोबार रुक-रुक कर सामने आता रहा है। कभी स्थानीय पुलिस की कार्रवाई, तो कभी उच्च स्तरीय जांच एजेंसियों की दखल के बावजूद सिंडीकेट की रीढ़ नहीं टूट सकी। जानकारों का कहना है कि जब तक संरक्षण और मिलीभगत की कड़ी पर चोट नहीं होगी, तब तक यह धंधा किसी न किसी रूप में जारी रहेगा।
पूछताछ में सामने आए नए नाम
गिरफ्तार अभियुक्तों से पूछताछ में जिन नामों का खुलासा हुआ है, उनसे स्पष्ट है कि गिरोह संगठित ढंग से काम कर रहा था। अलीनगर के प्रमोद चौहान पुत्र मुराहू चौहान, शेरू और राजू पुत्र मैनूद्दीन, सुहैल पुत्र निहालुद्दीन और चंदा चौहान सिंडिकेट को चलाते हैं। गिरोह टर्मिनल से निकलने वाले टैंकर चालकों और खलासियों से सांठगांठ कर प्रति लीटर कम कीमत पर तेल खरीदता था और बाजार में ऊंचे दाम पर बेचता था। मुनाफे का बंटवारा आपसी सहमति से किया जाता था।
संरक्षण पर उठे सवाल
बिना विभागीय संरक्षण के इतने बड़े पैमाने पर तेल चोरी संभव नहीं। आरोप लग रहे हैं कि पुलिस के साथ-साथ जिला पूर्ति विभाग के कुछ अधिकारी और कर्मचारी भी इस अवैध कारोबार की मलाई काट रहे थे। जब भी तेल चोरी का मामला उजागर होता है, तो पुलिसकर्मियों पर कार्रवाई होती है, लेकिन जिला पूर्ति विभाग के अधिकारियों और कर्मचारियों की भूमिका पर अक्सर पर्दा डाल दिया जाता है। इस बार भी सवाल उठ रहे हैं कि क्या जांच का दायरा पूर्ति विभाग तक पहुंचेगा या फिर कार्रवाई सीमित रह जाएगी।
सूत्रों का दावा है कि बिना विभागीय स्तर पर मिलीभगत के इतने बड़े पैमाने पर टैंकरों से तेल चोरी और भंडारण संभव नहीं है।
एडीजी की सख्ती के बाद बढ़ी उम्मीद
इस बार एडीजी स्तर की मॉनिटरिंग में हुई कार्रवाई से उम्मीद जगी है कि मामले की जांच गहराई तक जाएगी। यदि वित्तीय लेन-देन, कॉल डिटेल्स और संपत्ति की जांच निष्पक्ष तरीके से की जाए तो पूरे सिंडीकेट का नेटवर्क उजागर हो सकता है।

