चंदौलीराज्य/जिलासंस्कृति एवं ज्योतिष

श्रीमद्भागवत कथाः रास शब्द का मूल रस और रस स्वयं भगवान श्रीकृष्ण, ब्रह्म व जीव का मिलन ही रास

चंदौली। रास शब्द का मूल रस है और रस स्वयं भगवान श्रीकृष्ण ही हैं। जब भगवान स्वयं अनंत रस समूह में प्रकट होकर रूप, लीला, धाम और विभिन्न आलंबन व उद्दीपन के रूप में क्रीड़ा करें तो इसी को रास कहा जाता है। ब्रह्म व जीव का मिलन और सर्वाेच्च आनंद ही रास है। मसोई गांव में आयोजित श्रीमद्भागवत कथा के दौरान कथा वाचक शिवम शुक्ला ने श्रोताओं के समक्ष यह प्रसंग कहा।
रास का महत्व बताते हुए कहा रास पंचध्यायी का पहला शब्द है और अंतिम शब्द है विष्णो। यह साक्षात आनंदधन योगेश्वर आत्माराम भगवान श्रीकृष्ण की दिव्य लीला है। इसमें कामदेव का प्रवेश नहीं है। कहा कि ज्ञानियों को दिव्यांनंद, परमानंद व ब्रह्मानंद मिलता है। यह निम्न कक्षा का आनंद होता है। उसके बाद सगुण साकार का आनंद प्राप्त होता है। इसमें भी अनके स्तर हैं। शांत भाव का प्रेमानंद, उससे ऊंचा दास्य भाव प्रेमानंद, उससे ऊंचा सख्य भाव होता है। माधुर्य भाव के भी तीन स्तर हैं। समर्था रति का प्रेमानंद जिनको मिलता है, वह सिद्ध महापुरूषों में भी अरबों-खरबों में किसी एक को मिलता है, उस रस को महारास के रूप में राधाकृष्ण ने जीवों में वितरित किया था। कहा कि साधारण जीवों को भगवान की नकल नहीं करनी चाहिए। सूर्य की किरणें मल-मूत्र और मनुष्यों पर भी पड़ती हैं, लेकिन सूर्य अशुद्ध नहीं होता। शुकदेव जी परमहंस होकर राजा परीक्षित को यह कथा सुना रहे हैं और स्वयं भगवान शंकर इस लीला के साक्षी बने। इस लीला को श्रवण करने मात्र से हृदय के काम विकार समूल नष्ट हो जाते हैं और भगवान की परिभक्ति प्राप्त हो जाती है। कथा के अंत में धूमधाम से रूक्मणि विवाह का उत्सव मनाया गया। उद्धव-गोपी संवाद सुनकर श्रोता भावविभोर हो गए।

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