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चंदौलीचुनाव 2024

Loksabha Election 2024 : बीजेपी विधायक के आरोपों के बाद कमजोर संगठन को लेकर चर्चा शुरू, हिस्से में सफलताएं कम नाकामियां ज्यादा

चंदौली से बीजेपी प्रत्याशी डा. महेंद्रनाथ पांडेय की हार के बाद आरोप-प्रत्यारोप का दौर शुरू संगठन पर उठाए जा रहे सवाल, पदाधिकारियों के बूथों पर पिछड़ गई बीजेपी चुनाव में नहीं काम आई अपना बूथ सबसे मजबूत व पन्ना प्रमुख की रणनीति शीर्ष नेतृत्व के संकेत, हार के कारणों की होगी गहन समीक्षा, संगठन में हो सकता है व्यापक फेरबदल

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  • चंदौली से बीजेपी प्रत्याशी डा. महेंद्रनाथ पांडेय की हार के बाद आरोप-प्रत्यारोप का दौर शुरू संगठन पर उठाए जा रहे सवाल, पदाधिकारियों के बूथों पर पिछड़ गई बीजेपी चुनाव में नहीं काम आई अपना बूथ सबसे मजबूत व पन्ना प्रमुख की रणनीति शीर्ष नेतृत्व के संकेत, हार के कारणों की होगी गहन समीक्षा, संगठन में हो सकता है व्यापक फेरबदल
  • चंदौली से बीजेपी प्रत्याशी डा. महेंद्रनाथ पांडेय की हार के बाद आरोप-प्रत्यारोप का दौर शुरू
  • संगठन पर उठाए जा रहे सवाल, पदाधिकारियों के बूथों पर पिछड़ गई बीजेपी
  • चुनाव में नहीं काम आई अपना बूथ सबसे मजबूत व पन्ना प्रमुख की रणनीति
  • शीर्ष नेतृत्व के संकेत, हार के कारणों की होगी गहन समीक्षा, संगठन में हो सकता है व्यापक फेरबदल

 

चंदौली। सैयदराजा विधायक सुशील सिंह के आरोपों के बाद जिले में बीजेपी के कमजोर संगठन को लेकर चर्चाएं शुरू हो गई हैं। पिछले एक दशक में इस बार संगठन सबसे कमजोर नजर आ रहा है, जिसके हिस्से सफलताएं कम और नाकामियां अधिक हैं। लोकसभा चुनाव में संगठन धराशायी नजर आया। इसकी वजह से पार्टी पदाधिकारियों व पूर्व पदाधिकारियों के बूथों पर भी भाजपा हार गई। चुनाव में अपना बूथ सबसे मजबूत और पन्ना प्रमुख की रणनीति भी काम नहीं आई। बीजेपी नेतृत्व ने हार के कारणों की गहनता के साथ समीक्षा की बात कही है। ऐसे में संगठन में व्यापक स्तर पर फेरबदल की गुंजाइश है।

 

चंदौली लोकसभा चुनाव में केंद्रीय मंत्री की हार को पार्टी पचा नहीं पा रही है। इसको लेकर जनप्रतिनिधियों पर आरोप लगाए जा रहे हैं। विधायक सुशील सिंह ने संगठन को कटघरे में खड़ा किया है। जाहिर है कि कोई भी चुनाव संगठन के आधार पर ही लड़ा जाता है। लेकिन इस बार बीजेपी का संगठन कमजोर नजर आ रहा। लोकसभा चुनाव में बूथों पर इसकी बानगी देखने को मिली। मतदाताओं पर बीजेपी की पकड़ ढीली नजर आई। इसके पीछे सबसे बड़ा कारण सत्तासुख भोग रहे पार्टी से जुड़े लोगों का जनता से दूर होना है। निकाय चुनाव में जिले में मिली हार से भी बीजेपी ने सबक नहीं लिया और लोकसभा चुनाव में भी संगठन मोदी की गारंटी के सहारे ही रहा। स्थानीय स्तर पर कारगर प्रयास नहीं किए गए। इसकी वजह से इंडिया गठबंधन को मौका मिल गया और बसपा के कमजोर पड़ने के बाद भाजपा से जुड़ा रहा दलित वोट बैंक इस बार चुनाव में सपा की ओर शिफ्ट हो गया। बीजेपी की हार का प्रमुख कारण इसे भी माना जा रहा है। विश्वस्त सूत्रों की मानें तो जिन-जिन बूथों पर पार्टी को हार का सामना करना पड़ा है, वहां व्यापक स्तर पर फेरबदल हो सकते हैं। सैयदराजा विधायक ने एक बार फिर अपनी बात दोहराई है। उन्होंने कहा कि हार की गहन समीक्षा होनी चाहिए, लेकिन संगठन के दायित्वों व कार्यों की भी समीक्षा की जाए।

 

बूथ प्रभारियों की पकड़ कमजोर

इस बार चुनाव में बूथ प्रभारियों की मतदाताओं पर पकड़ कमजोर रही। बूथ प्रभारी मतदाताओं को घर से निकालकर बूथों तक लाने में असफल रहे। पन्ना प्रमुख भी चुनाव में कोई कमाल नहीं दिखा सके। इसकी वजह से बीजेपी का वोट प्रतिशत घटा और चुनाव में पराजय हाथ लगी।

 

 

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