
वित्तमंत्री निर्मला सीतारमण ने संसद में केंद्रीय बजट पेश किया। इसमें रक्षा, एमएसएमई, रेलवे समेत तमाम घोषणाएं की गईं। केंद्र सरकार के बजट पर (SEBI पंजीकृत निवेश सलाहकार एवं Daddy’s International School, बिशुपुरा कांटा, चंदौली का संस्थापक) डॉ. विनय प्रकाश तिवारी अपनी राय साझा कर रहे हैं……….।
रक्षा, कैपेक्स और बाजार
बजट 2026-27 पढ़ते हुए मेरे मन में बार-बार यही सवाल उठा कि क्या सरकार ने देश की आर्थिक रफ्तार पर ब्रेक लगा दिया है। एक निवेश सलाहकार और शिक्षक दोनों की नजर से मुझे इसमें स्थिरता तो दिखती है, लेकिन वह आक्रामक सोच नहीं दिखती जिसकी आज देश को जरूरत है। रक्षा बजट देखें तो दस्तावेज़ में लगभग ₹5.95 लाख करोड़ का प्रावधान है, जो कुल खर्च का करीब 11% है। हिस्सा वही, पर रकम के स्तर पर वृद्धि कमज़ोर दिखती है, क्योंकि पिछले वर्ष ₹6.81 लाख करोड़ की चर्चा थी। जब “मेक इन इंडिया” के तहत भारत रक्षा निर्यातक बनने की दिशा में बढ़ रहा था, जब दुनिया में चर्चा शुरू हो चुकी थी कि भारत से हथियार खरीदे जा सकते हैं, तब घरेलू रक्षा खर्च में यह ठंडापन सवाल खड़े करता है। क्या सरकार रक्षा विस्तार की बजाय खर्च नियंत्रण के मोड में आ गई है? क्या अन्य योजनाओं के लिए संसाधन जुटाने की मजबूरी में रक्षा बजट पर ही ब्रेक लगाया गया?
कैपेक्स की तरफ बढ़ें तो तस्वीर और साफ हो जाती है। ₹11.81 लाख करोड़ से बढ़ाकर ₹12.9 लाख करोड़—सिर्फ लगभग ₹1 लाख करोड़ की बढ़ोतरी। आम आदमी की भाषा में कहें तो अगर आय बढ़ानी है तो पहले निवेश बढ़ाना पड़ता है। सरकार यहाँ खर्च बचाकर कमाई बढ़ाने की उम्मीद कर रही है। इन्फ्रास्ट्रक्चर पर खर्च का असर कई गुना होता है—नौकरियाँ बनती हैं, स्टील-सीमेंट बिकता है, ट्रांसपोर्ट चलता है, छोटे कारोबारों को काम मिलता है। ऐसे समय में ₹14 लाख करोड़ या उससे ऊपर का लक्ष्य देश को नई गति देता। अभी ऐसा लगता है जैसे सरकार दो नावों को साथ संभालने की कोशिश कर रही है—राजकोषीय अनुशासन और विकास—और इस कोशिश में दोनों नावें डगमगाती दिख रही हैं।
हाई-स्पीड रेल कॉरिडोरों की घोषणा भविष्य की तस्वीर जरूर दिखाती है। बजट में सात हाई‑स्पीड रेल कॉरिडोर – मुंबई‑पुणे, पुणे‑हैदराबाद, हैदराबाद‑बेंगलुरु, हैदराबाद‑चेन्नई, चेन्नई‑बेंगलुरु, दिल्ली‑वाराणसी और वाराणसी‑सिलीगुड़ी – का ऐलान किया गया। बतौर एक नागरिक, मुझे यह सकारात्मक पहल लगती है। अगर ये परियोजनाएँ तय समय पर पूरी होती हैं तो वे व्यवसाय, पर्यटन और क्षेत्रीय विकास को नई गति देंगी।
PFC और REC का पुनर्गठन भी अहम है। ये संस्थाएँ बिजली परियोजनाओं को वित्त देती हैं, बिजली कंपनियों को ऋण उपलब्ध कराती हैं और देश के ऊर्जा इन्फ्रास्ट्रक्चर की रीढ़ हैं। इनके मजबूत होने का मतलब है ऊर्जा क्षेत्र में अधिक निवेश और तेज बुनियादी ढांचा विकास, यह कदम सराहनीय है।
स्टॉक मार्केट के मोर्चे पर तस्वीर निराशाजनक है। STT बढ़ाकर फ्यूचर्स को 0.02% से 0.05% और ऑप्शंस को 0.15% तक ले जाना सक्रिय ट्रेडर्स पर सीधा बोझ है। हर साल ट्रेडिंग को महँगा बनाना क्या समाधान है? अगर राजस्व चाहिए तो साफ कहिए, और अगर निवेशकों की सुरक्षा चिंता है तो शिक्षा और नियमन लाइए।
टैक्स बढ़ाना सबसे आसान, पर सबसे कम समझदारी वाला रास्ता है। मध्यम वर्ग की उम्मीदें आयकर स्लैब में राहत से थीं, लेकिन यहाँ भी शून्य परिवर्तन। महंगाई, EMI और रोजमर्रा के खर्च बढ़े—पर टैक्स ढांचा जस का तस। शिक्षा में ₹1.39 लाख करोड़ का आवंटन और AI व गेमिंग पर जोर भविष्य की दिशा दिखाता है, पर जमीनी शिक्षा ढांचा अभी भी सुधार मांगता है।
स्वास्थ्य में 17 कैंसर दवाओं पर शुल्क हटाना मानवीय कदम है। SGB नीति में बदलाव भरोसे को चोट पहुँचाता है। पहले रिडेम्प्शन टैक्स-फ्री बताया गया था, अब व्याख्या बदली जा रही है। निवेशकों ने भरोसा करके बॉन्ड लिए और अब नियम बदले जा रहे हैं। डेटा सेंटर सेक्टर को 2047 तक टैक्स इंसेंटिव देना रणनीतिक निर्णय है—डिजिटल अर्थव्यवस्था को मजबूती देगा।
सरकार का पैसा आता कहाँ से है और जाता कहाँ है। जब सरकार 100 रुपये खर्च करती है तो लगभग 24 रुपये उधार लेकर। यानी हर चौथा रुपया कर्ज का। कमाई में 21 रुपये आयकर से, 18 रुपये कॉर्पोरेट टैक्स से आते हैं। खर्च में सबसे बड़ा हिस्सा राज्यों को जाता है और लगभग 20 रुपये पुराने कर्ज के ब्याज में चले जाते हैं। यानी देश का बड़ा हिस्सा “विकास” पर नहीं, “पुराने कर्ज” पर खर्च हो रहा है।
बजट भाषण के दौरान निफ्टी 50 ने 25,437 का उच्च स्तर और 24,590 का निम्न स्तर छुआ। यह सिर्फ सामान्य उतार-चढ़ाव नहीं था, बल्कि बाजार की मानसिक स्थिति को दिखाने वाला संकेत था। निवेशक बजट में बड़े कैपेक्स, कर राहत या विकास को तेज करने वाले कदमों की उम्मीद कर रहे थे, लेकिन जब तस्वीर स्पष्ट हुई तो भरोसा कमजोर पड़ता दिखा। इसी दौरान STT में बढ़ोतरी—खासतौर पर F&O यानी फ्यूचर्स और ऑप्शंस ट्रेडिंग पर—ने सक्रिय ट्रेडर्स की चिंता और बढ़ा दी। फ्यूचर्स पर STT 0.02% से 0.05% और ऑप्शंस पर 0.15% तक जाने का मतलब है कि हर ट्रेड महँगा हो गया। जो ट्रेडर रोज़ाना कई पोज़िशन लेते हैं, उनके लिए लागत सीधी बढ़ गई। ऐसे समय में जब बाजार को भागीदारी और लिक्विडिटी की जरूरत थी, टैक्स बोझ बढ़ने से उत्साह घटता है। इसलिए बजट के दौरान दिखी यह गिरावट सिर्फ आंकड़ा नहीं थी—यह बाजार के मन की निराशा और असमंजस की झलक थी।
मेरी नजर में यह बजट संतुलन साधने की कोशिश है, पर वह आक्रामक कदम नहीं उठाता जो अर्थव्यवस्था को नई रफ्तार दे सकते थे। सरकार ने अनुशासन चुना है, जबकि देश की जरूरत गति है। सवाल यही है—क्या यह सावधानी भविष्य में लाभ देगी, या हम अवसर खो रहे हैं? —
डॉ. विनय प्रकाश तिवारी (SEBI पंजीकृत निवेश सलाहकार एवं Daddy’s International School, बिशुपुरा कांटा, चंदौली का संस्थापक)

