
बजट सिर्फ आय-व्यय का दस्तावेज़ नहीं होता, यह सरकार की सोच, प्राथमिकताओं और देश की आर्थिक दिशा का संकेत देता है। बजट 2026-27 को पढ़ने के बाद जो भावना उभरती है, वह है – सावधानी बहुत, आक्रामकता कम। सवाल यह है कि क्या आज भारत को यही चाहिए था? केंद्रीय बजट पर SEBI Registered Investment Advisor, Founder, Daddy’s International School Bishunpura Kanta, Chandauli डॉ. विनय प्रकाश तिवारी अपनी राय व्यक्त कर रहे हैं……।
देश की अर्थव्यवस्था उस मोड़ पर है जहां निवेश, रोजगार और मांग को तेज़ धक्का देने की जरूरत है। लेकिन बजट में कैपेक्स यानी पूंजीगत व्यय की वृद्धि लगभग 11% के आसपास दिखाई गई है। सुनने में यह ठीक लग सकता है, पर जब महंगाई 6–7% हो, निर्माण लागत, स्टील, सीमेंट, मशीनरी सब महंगे हो रहे हों, तब यह वृद्धि असली अर्थ में बहुत सीमित रह जाती है। इंफ्रास्ट्रक्चर खर्च का गुणक प्रभाव होता है – सड़क बनती है तो ट्रक चलते हैं, ट्रक चलते हैं तो डीजल बिकता है, माल चलता है तो उद्योग चलता है, रोजगार बनते हैं। यहाँ बड़ी छलांग की जरूरत थी, लेकिन कदम नापकर रखे गए हैं।
रक्षा बजट पर नज़र डालें तो कुल आवंटन लगभग ₹7.85 लाख करोड़ है, लेकिन इसमें रक्षा पेंशन का बड़ा हिस्सा शामिल है। पेंशन घटाने के बाद वास्तविक आधुनिकीकरण और ऑपरेशनल खर्च करीब ₹6.04 लाख करोड़ के आसपास बैठता है। वृद्धि दिखाई देती है, लेकिन सवाल यह है कि क्या यह उस स्तर की है जिसकी भारत को जरूरत है, जबकि हम दुनिया से कह रहे हैं कि भारत रक्षा निर्यातक बनेगा, “मेक इन India” के तहत हथियार निर्माण बढ़ेगा, वैश्विक सप्लाई चेन में भारत की भूमिका बढ़ेगी? विजन बड़ा है, पर बजट की रफ्तार सतर्क है। यही विरोधाभास चिंता पैदा करता है।
इसी बीच एक क्षेत्र ऐसा है जहाँ बजट ने दूरदर्शी और सकारात्मक संकेत दिया है- हाई-स्पीड रेल कॉरिडोर। मुंबई-पुणे से लेकर वाराणसी-सिलीगुड़ी तक घोषित कॉरिडोर सिर्फ तेज़ ट्रेनें नहीं हैं, ये भविष्य के आर्थिक कॉरिडोर हैं। जहाँ तेज़ कनेक्टिविटी जाती है, वहाँ उद्योग बसते हैं, लॉजिस्टिक्स लागत घटती है, पर्यटन बढ़ता है और नए शहरी केंद्र विकसित होते हैं। अगर ये परियोजनाएँ समय पर पूरी होती हैं, तो यह रोजगार, निवेश और क्षेत्रीय संतुलन के लिए बड़ा बदलाव ला सकती हैं। यह बजट का एक स्पष्ट सकारात्मक और भविष्यवादी पक्ष है।
अब मध्यम वर्ग की बात। यही वर्ग हर महीने TDS देता है, GST देता है, पेट्रोल पर टैक्स देता है, हर सेवा पर टैक्स देता है। लेकिन आयकर स्लैब में राहत नहीं। महंगाई बढ़ी, EMI बढ़ी, जीवनयापन महँगा हुआ, पर टैक्स ढांचा जस का तस। बदले में क्या मिलता है? न सार्वभौमिक पेंशन, न सरकारी स्वास्थ्य सुरक्षा जो निजी अस्पताल के बिल से बचा सके। नौकरी अस्थिर, व्यापार जोखिम भरा, और बचत सीमित। यह वर्ग न गरीब है कि उसे योजना मिले, न अमीर कि उसे चिंता न हो। यही वर्ग सबसे ज्यादा दबाव में है।
अब शेयर बाजार और खुदरा निवेशकों की बात। STT यानी सिक्योरिटीज ट्रांजैक्शन टैक्स में बढ़ोतरी ने सक्रिय ट्रेडर्स पर सीधा बोझ डाला है। हर बजट में लेन-देन महँगा करना क्या समाधान है? पूंजी बाजार जोखिम आधारित है; लोग अपनी जिम्मेदारी पर भाग लेते हैं। अगर उद्देश्य सुरक्षा है तो वित्तीय शिक्षा बढ़ाइए, नियमन मजबूत कीजिए। और अगर राजस्व चाहिए तो स्पष्ट कहिए। टैक्स बढ़ाना सबसे आसान रास्ता है, लेकिन यह बाजार भागीदारी को हतोत्साहित करता है।
सवाल यह भी है कि अगर बाजार जोखिम भरा है, तो जो 95–97% लोग आज भी FD या सुरक्षित निवेश में पैसा रखते हैं, उनके लिए नई, आकर्षक, मध्यम वर्ग केंद्रित योजनाएँ क्यों नहीं लाई जातीं? क्यों हर बार नीतिगत बदलाव का पहला असर उन्हीं पर पड़ता है जो पूंजी बाजार में भाग लेते हैं? यहाँ Sovereign Gold Bond (SGB) का मुद्दा भी जुड़ता है। जब SGB शुरू हुआ, तब स्पष्ट संदेश दिया गया था कि मैच्योरिटी पर रिडेम्प्शन टैक्स-फ्री होगा। लोगों ने फिजिकल गोल्ड छोड़कर सरकारी बॉन्ड लिया -यह सरकार पर भरोसा था। अब नियमों की व्याख्या बदलती दिख रही है, जिससे कुछ स्थितियों में टैक्स देनदारी बन सकती है। निवेश का आधार सिर्फ रिटर्न नहीं, भरोसा भी होता है। अगर नियम बदलते दिखें, तो विश्वास डगमगाता है।
शिक्षा बजट में लगभग 8% की वृद्धि दिखाई गई है – ₹1.28 लाख करोड़ से बढ़कर करीब ₹1.39 लाख करोड़। लेकिन महंगाई घटाकर देखें तो वास्तविक वृद्धि बहुत सीमित है। AI, डिजिटल शिक्षा, स्किल की बात सही दिशा है, लेकिन यह “मेंटेनेंस बजट” ज्यादा लगता है, “परिवर्तन बजट” कम। स्कूलों, कॉलेजों और बुनियादी ढांचे में बड़े सुधार के लिए बड़ी छलांग चाहिए।
सरकार 100 रुपये खर्च करती है तो लगभग 24 रुपये उधार लेकर। यानी हर चौथा रुपया कर्ज का। खर्च का बड़ा हिस्सा पुराने कर्ज के ब्याज में चला जाता है। इसका मतलब है कि संसाधन विकास से ज्यादा कर्ज चुकाने में लग रहे हैं। यह अनुशासन दिखाता है, पर विकास की गति को सीमित भी कर सकता है।
यह बजट संतुलन साधने की कोशिश जरूर है, लेकिन संतुलन और ठहराव के बीच एक महीन फर्क होता है। सरकार ने अनुशासन को प्राथमिकता दी है, जोखिम कम रखने की कोशिश की है। कुछ फैसले दूरदर्शी हैं- जैसे हाई-स्पीड रेल और डिजिटल ढांचा। कुछ मानवीय भी हैं। लेकिन बड़ा सवाल यह है कि क्या यह समय सिर्फ संतुलन का था, या साहसी सामाजिक-आर्थिक सुधारों का?
आम आदमी के जीवन पर सबसे सीधा असर ईंधन कीमतों का होता है, फिर भी पेट्रोल-डीजल पर एक्साइज ड्यूटी में राहत नहीं दिखती। जब परिवहन महँगा रहेगा, तो हर चीज़ महँगी रहेगी। महंगाई से लड़ाई सिर्फ ब्याज दरों से नहीं, लागत घटाने से भी लड़ी जाती है। पूंजी बाजार को बढ़ावा देने की बात होती है, लेकिन STCG और LTCG में राहत नहीं। क्रिप्टोकरेंसी लाखों युवाओं के निवेश का हिस्सा बन चुकी है, लेकिन स्पष्ट नियमन अब तक नहीं। अनिश्चितता निवेश को बढ़ावा नहीं देती, डर बढ़ाती है।
सामाजिक सुरक्षा के मोर्चे पर असली बदलाव कब आएगा? देश में करोड़ों लोग ऐसे हैं जिनके परिवार की आय एक व्यक्ति पर निर्भर है। यदि 60 वर्ष से कम आयु का कमाने वाला सदस्य असमय मृत्यु का शिकार हो जाए, तो परिवार आर्थिक रूप से टूट जाता है। क्या सरकार आय-प्रतिस्थापन (Income Replacement) योजना पर विचार करेगी? क्या स्थायी विकलांगता (Permanent Disability) की स्थिति में मुफ्त बीमा कवर देने की दिशा में कोई ठोस नीति बनेगी?
शिक्षा सुधार की बात वर्षों से होती है, लेकिन क्या अब समय नहीं आ गया कि सरकारी स्कूलों के प्रबंधन में निजी क्षेत्र की दक्षता जोड़ी जाए- जवाबदेही, प्रोत्साहन और परिणाम आधारित व्यवस्था के साथ? क्या उच्च शिक्षा के लिए एक ऐसा सिंगल-विंडो सिस्टम नहीं होना चाहिए जो भारतीय छात्रों को किसी भी देश में पढ़ाई के लिए सुगम मार्ग दे सके? प्रशासनिक सुधारों की बात करें तो क्या हर पुलिसकर्मी के लिए बॉडी-कैमरा और ऑडियो रिकॉर्डिंग अनिवार्य नहीं होनी चाहिए, ताकि पारदर्शिता और जवाबदेही बढ़े? जेलों के आधुनिकीकरण पर गंभीर निवेश कब होगा? न्याय और सुधार सिर्फ कानून से नहीं, ढांचे से भी आते हैं।
सरकारी नौकरियों की भर्ती में हर साल अलग-अलग परीक्षाओं की जगह क्या एक सिंगल नेशनल रैंकिंग सिस्टम नहीं हो सकता, जहाँ योग्यता के आधार पर हर वर्ष पद आवंटित हों? और बेहतर प्रदर्शन करने वाले अभ्यर्थियों को अगली रैंक सुधार पर सीधे पदोन्नति का अवसर मिले, बिना अनावश्यक इस्तीफे-पुनर्नियुक्ति की जटिलता के? ये सवाल सिर्फ बजट से नहीं, शासन की दिशा से जुड़े हैं। बजट ने वित्तीय अनुशासन दिखाया है, लेकिन देश की सामाजिक-आर्थिक संरचना को नई ऊँचाई पर ले जाने वाले सुधारों की झलक अभी भी अधूरी है। आख़िरकार सवाल यही है – क्या हम सिर्फ संतुलन बचाने में लगे हैं, या उस भविष्य की तैयारी कर रहे हैं जहाँ भारत सिर्फ स्थिर नहीं, बल्कि निर्णायक रूप से आगे बढ़ता हुआ दिखाई दे?
– डॉ. विनय प्रकाश तिवारी
SEBI Registered Investment Advisor
Founder, Daddy’s International School
Bishunpura Kanta, Chandauli

