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Chandauli News : लैंगिक और जातिगत भेदभाव के खिलाफ यूजीसी इक्विटी रेगुलेशन को बनाया जाए प्रभावी

चंदौली। ऑल इंडिया फोरम फॉर इक्विटी के बैनर तले इंकलाबी नौजवान सभा, एपवा, आइसा के नेतृत्व में कार्यकर्ताओं ने मंगलवार को धरना स्थल से जिलाधिकारी कार्यालय तक समता अधिकार मार्च किया।

कहा कि हम सुप्रीम कोर्ट की ओर से विश्वविद्यालय परिसर में लैंगिक और जातिगत भेदभाव के खिलाफ यूजीसी इक्विटी रेगुलेशन 2026 पर अस्थाई रूप से रोक लगाने की निंदा करते हैं। उच्चतम न्यायालय की ओर से यह फैसला लैंगिक और जातिगत भेदभाव के बढ़ते मामलों के तथ्यों को अनदेखी करते हुए लाया गया है। इस फैसले में दुरुपयोग होने को आधार बना करके समानता की ओर बढ़े कदम पर रोक लगा दी गई है। जबकि यह एक स्थापित तथ्य है कि दुरुपयोग होने की संभावना सभी कानूनो में होती है। इस दुरुपयोग को ही प्रमुख विषय बनाते हुए उत्पीड़न के लगातार बढ़ते मामले, जिसकी पुष्टि हाल में ही सरकार की एक रिपोर्ट से होती है जिसमें विश्वविद्यालय में 118 प्रतिशत जातिगत भेदभाव और उत्पीड़न के मामले को बढ़ा हुआ बताया गया है, रोकने के लिए प्रभावी और ठोस कदम उठाने से रोक दिया गया है।

 

सुप्रीम कोर्ट की ओर से लगाई गई यह रोक ठीक अनुसूचित जाति जनजाति एक्ट के फैसले में किए गए बदलाव की तरह है जिसके खिलाफ पूरे देश में आंदोलन हुआ था जिसको सरकार को पुनः वापस लेना पड़ा था। विश्वविद्यालय परिसर में विद्यमान संरचनात्मक जातिगत भेदभाव के मामले लगातार बढ़ रहे हैं। जातिगत भेदभाव के कारण ही रोहित वेमुला, दर्शन सोलंकी, पायल तडवी जैसे छात्रों को मजबूर होकर आत्महत्या करनी पड़ी। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के अनुसार छात्रों के आत्महत्या के मामले बढ़ रहे हैं जिसमें बड़ी संख्या दलित, पिछड़े वर्ग से आने वाले छात्रों की हैं। विश्वविद्यालय में विभिन्न स्तरों पर पर्याप्त प्रतिनिधित्व नहीं होने के कारण छात्रों के साथ लिंग, नस्ल, क्षेत्र और जातिगत भेदभाव होने की संभावना बनी रहती है जिसे दूर करने के लिए एक प्रभावी और ठोस कदम उठाए जाने की जरूरत है। वर्तमान यूजीसी रेगुलेशन सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर ही लाया गया एक जरूरी कदम था जिसको बिना मेरिट,तथ्य और तर्क के रोक लगा दी गई है।

हम मांग करते है कि सरकार यूजीसी रेगुलेशन को और अधिक जवाब देह जिम्मेदार और प्रभावी बनाकर लागू किया जाए। इसमें चुने हुए छात्रों का प्रतिनिधित्व और नागरिक समाज के लोगों को भी सदस्य बनाया जाए ताकि जातिगत उत्पीड़न के मामले में बिना किसी भेदभाव के कार्यवाही और सुनवाई हो सके।

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